गणतंत्र दिवस पर विशेष- ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ विद्रोह करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के वंशज आज भी उपेक्षा और गुमनामी का जीवन जीने मजबूर
- शेख हसन खान, गरियाबंद
- मैनपुर से 16 कि.मी.दूर गाताभर्री के स्वतंत्रता सेनानी माखन लाल विश्वकर्मा को अंग्रेजी हुकुमत ने जो यातनाएं दी सुनकर खुन उबल उठता है
- देश को आजाद कराने माखन लाल विश्वकर्मा दर्जनों बार गए जेल, जंगलों में पेड़ों के पत्ते खाकर संग्राम में निभाते थे सहभागिता
- देश के पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ताम्रपत्र देकर किया था सम्मानित
गरियाबंद। ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में बहुमुल्य योगदान देने वाले स्वतंत्रता सेनानी माखन लाल विश्वकर्मा को भले ही अब भुला दिया गया हो लेकिन उन्होने एक छोटे से गांव गाताभर्री में जन्म लेकर अग्रेजी अफसरो के दांत खट्टे कर दिए थे। देश को आजाद कराने की लड़ाई में माखन लाल विश्वकर्मा को दर्जनो बार जेल जाना पड़ा जंगलो में रहकर पेड़ के पत्तों को खाकर गुजारा करते थे और अग्रेजो के द्वारा उन्हे जो यातनाए दी गई उसे सुनकर आज की युवाओं के खुन उबल उठता है। स्वतंत्रता सेनानी माखन लाल विश्वकार्म को स्वतंत्रता आन्दोलन में पकड़े जाने पर पेड़ उनके हाथो और पैर में लोहे की खिल ठोककर लटका देते थे बवजूद इसके युवा स्वंतंत्रता सेनानी माखन लाल विश्वकार्म ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ अपना आन्दोलन जारी रखा और देश आजाद होने के बाद सम्मान भी उन्हे दिया गया। आजादी के 25वीं वर्षगांठ पर भारत के तत्कालिन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने माखनलाल विश्वकर्मा को ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया गया है जो आज उनके वंशजो के पास सुरक्षित रखा गया है।

तहसील मुख्यालय मैनपुर से महज 16 किमी दूर धमतरी जिले के नगरी ब्लाक के अंतिम गांव तुमड़ीबहार गाताभर्री में माखनलाल विश्वकर्मा का जन्म 1913 में हुआ और जवानी में ही कदम रखते उन्होंने अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ स्वतंत्रता आन्दोलन में कुद पड़े। आज तुमड़ीबहार में उनके परिजनों द्वारा एक प्रतिमा स्वयं के खर्च से स्थापित किया गया है। उनके वंशज और स्वतंत्रता सेनानी के भाई के पौत्र खेमलाल विश्वकर्मा, पदमनी विश्वकर्मा ,हिरामत बाई विश्वकर्मा , हेमबाई विश्वकर्मा एवं परिजनों ने चर्चा में बताया कि उन्होंने अपने पिता से उनके दादा स्वतंत्रता सेनानी माखनलाल विश्वकर्मा के बारे में जो सुने है और सरकारी रिकार्ड उनके पास मौजूद है जिसमें स्वत्रंता सेनानी माखनलाल विश्वकर्मा ने प्रारंभिक शिक्षा के साथ ही ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ इस छोटे से गांव से अपना जंग छेड़ दिया था तब युवा अवस्था में उनके दादा को कई बार अंग्रेजों ने जेल के सलाखो के पिछे डाल दिया और तो और नागपुर और औड़िसा के जेल में बंद कर दिया उनके हाथ और पैर को बेड़ियों से जकड़ दिया जाता था। हाथों और पैरो में लोहे की किल ठोकर पेड़ों में लटका देते थे अंतिम समय तक उनके हाथ और पैर में यह निशान रहा । परिजन बताते है आज उनके दादा माखनलाल विश्वकार्मा की प्रतिमा भले सरकार नहीं लगाई है। परिवार वाले लगाए है लेकिन हमें गर्व है कि हमारे दादा ने देश के आजादी के लिए अपना सबकुछ न्यूछावर कर दिया।

- स्वतंत्रता सेनानी के परिजनो के तरफ नहीं दिया शासन प्रशासन ने ध्यान
मखन लाल विश्वकर्मा देश के आजादी में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया जिसके चलते उन्हे अंतिम समय तक वाहनों में कहीं आने जाने पर किराए नहीं लगता था और देश के तत्कालिन प्रधानमंत्री द्वारा उन्हे ताम्रपत्र सम्मान भी प्रदान किया गया था। उनके पत्नी को भी बिसाईन बाई विश्वकर्मा को अंतिम समय तक पेंशन मिलता था लेकिन उनके परिजनो को शासन की कोई योजना का लाभ नहीं मिला । स्वतंत्रता सेनानी के परिजनों को जमीन देने की योजना था। वह भी नहीं मिल पाया और उनके नाम से कोई बड़े सरकारी भवनों का नामकरण नहीं किया गया ।
