शरद पूर्णिमा की दूधिया चांदनी में जगमगाई चौकशील पहाड़ी – मेले में उमड़ा 50 हजार श्रद्धालुओं का जनसैलाब
- शेख हसन खान, गरियाबंद
- आदिवासी संस्कृति का अनूठा संगम- उदंती अभ्यारण्य के घने जंगलों में गूंजे मां गढ़िया माता के जयकारे
- 12 किलोमीटर के सफर के लिए घंटों जूझना पड़ा, पारंपरिक वाद्ययंत्रों और लोकनृत्यों से रातभर गुलजार रही पहाड़ी
गरियाबंद। गरियाबंद जिले के तहसील मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर उदंती अभ्यारण्य के घने जंगलों और सतह से करीब 1300 मीटर ऊंची चौकशील पहाड़ी पर आयोजित तीन दिवसीय मेले के दौरान आज रविवार को शरद पूर्णिमा की रात आस्था का अभूतपूर्व सैलाब उमड़ पड़ा। मां गढ़िया माता के दरबार में आयोजित इस ऐतिहासिक मेले में छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों के साथ-साथ पड़ोसी राज्य ओडिशा से भी 50 हजार से अधिक श्रद्धालु शामिल हुए।

- बिना बिजली की रोशनी का अनूठा आयोजन
यह छत्तीसगढ़ का पहला और इकलौता ऐसा अनूठा मेला है, जो रोशनी के बिना, केवल शरद पूर्णिमा के चांद की प्राकृतिक और दूधिया चांदनी में पूरी रात आयोजित किया जाता है। खुले आसमान के नीचे आयोजित इस धार्मिक व सांस्कृतिक अनुष्ठान ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।
- पारंपरिक वाद्ययंत्रों और डांग-डोली के साथ निकली शोभायात्रा
मेले में बस्तर से लेकर ओडिशा तक के आदिवासी समाज के लोग अपने देवी-देवताओं की डांग-डोली, ध्वज-पताका और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ पहुंचे। दोपहर तीन बजे देवी-देवताओं के गढ़िया माता दरबार में आगमन के बाद विधिवत पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान पारंपरिक वेशभूषा में सजे श्रद्धालुओं ने तीर-धनुष, तलवार और फरसा के साथ भव्य शोभायात्रा निकाली, जिससे पूरा पहाड़ी क्षेत्र गूंज उठा।
लोकनृत्यों ने बांधा समां-रातभर चले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अनेक दलों के लोकनृत्य और उड़िया नाटकों की प्रस्तुतियां आकर्षण का केंद्र रहीं। वहीं, प्रदेशभर से पहुंचे बैगा, सिरहा, पुजारियों और झांकरों ने विचार गोष्ठी के माध्यम से प्राचीन देव-पूजा पद्धति और समृद्ध परंपराओं पर चर्चा की।
- भारी उत्साह और भीषण जाम
मेले को लेकर लोगों में भारी उत्साह देखा गया। मैनपुर-देवभोग हाईवे से चौकशील पहाड़ी तक के 12 किलोमीटर लंबे कच्चे मार्ग पर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं। ग्रामीणों के श्रमदान से बने इस मार्ग पर पैदल यात्रियों के अलावा सैकड़ों ट्रैक्टर, जीप, कार और बैलगाड़ियां फंसी रहीं, जिससे गंतव्य तक पहुंचने में लोगों को 6 से 7 घंटे का समय लगा। इसके बावजूद श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ और आदिवासी संस्कृति का यह गौरवशाली पर्व सफलता के साथ संपन्न हुआ।
