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November 5, 2026

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संतोष सिन्हा के साइकिल की घंटी और इत्र की खुशबू से महक उठता है 500 से अधिक गांव

  • शेख हसन खान, गरियाबंद 
  • इत्र की महक बिखेर रहे संतोष सिन्हा साइकिल के माध्यम से पहुंचते गांव गांव इत्र बेचने
  • संतोष ने कहा कोई काम छोटा बड़ा नही वह अपने पुस्तैनी इत्र बेचने के कार्य से संतुष्ट है

गरियाबंद । विकास और आधुनिकता के इस दौर में जहां सब कुछ ऑनलाइन और स्प्रे-परफ्यूम पर टिक गया है, वहीं गरियाबंद जिले के एक शख्स ने परंपरा की खुशबू को आज भी जीवंत रखा है। हम बात कर रहे हैं गरियाबंद जिले के रानीपरतेवा निवासी 58 वर्षीय संतोष कुमार सिन्हा की, जो पिछले 35 वर्षों से रोजाना 20 से 25 किलोमीटर साइकिल चलाकर जिले के 500 से अधिक गांवों में घर-घर इत्र बेचने का अनूठा कार्य कर रहे हैं। संतोष कुमार सिन्हा ने मैनपुर में चर्चा के दौरान बताया कि यह उनका पुस्तैनी व्यवसाय है उनके पिता स्वर्गीय डेहरूराम सिन्हा वर्ष 1980 से गांव-गांव जाकर इत्र बेचने का कार्य करते थे साल 2006 में पिता के निधन के बाद इस पुश्तैनी जिम्मेदारी को पूरी तरह संतोष ने अपने कंधों पर ले लिया आज वे मैनपुर, देवभोग, अमलीपदर, गरियाबंद, छुरा, राजिम और फिंगेश्वर सहित 500 से अधिक गांवों में साइकिल से पहुंचते हैं। उनकी इस मेहनत और लगन के मुरीद आम किसानों से लेकर विधायक, सांसद और बड़े-बड़े अफसर तक हैं।

उत्तर प्रदेश के कन्नौज से आता है खास इत्र – संतोष सिन्हा बताते हैं कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। उनके पास उत्तर प्रदेश के कन्नौज से बेहतरीन क्वालिटी का इत्र मंगवाया जाता है, जिसकी ग्रामीण इलाकों में भारी डिमांड है। उनके पास इत्र की लंबी रेंज उपलब्ध है, जिनमें मुख्य रूप से शामिल हैं मोंगरा और चमेली, फिरदोस और चारली, चंदन और गुलाब, फुलवारी और राजदरबार, खस और अन्य कई वैरायटीज के इत्र मौजूद है और वे गांव गांव इत्र 20 रूपये से लेकर 500 रूपये तक बेचते है उन्होने बताया कि खासकर नवरात्र, दशहरा, दीपावली, होली, ईद और अन्य त्योहारों के मौकों पर उनके इत्र की मांग बहुत ज्यादा बढ़ जाती है।

साइकिल की घंटी और इत्र की महक से महक उठता है गांव – भले ही आज बाजार में तरह-तरह के आधुनिक परफ्यूम और स्प्रे आ चुके हैं, लेकिन बुजुर्गों और पुराने लोगो को पसंद करने वालों के बीच आज भी संतोष के इत्र का जादू बरकरार है। संतोष जहां भी जाते हैं, वहां लोगों को अपने हाथों से इत्र लगाकर उनकी जिंदगी को खुशबू से महका देते हैं।

  • सादगी भरा जीवन और संतुष्टि

अपनी आजीविका के बारे में बात करते हुए संतोष ने बताया कि उनके पास दो एकड़ जमीन है और शासन की ओर से उन्हें 35 किलो चावल योजना का लाभ भी मिलता है। परिवार के भरण-पोषण के लिए वे पूरी मेहनत से यह काम कर रहे हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि इस सादगी भरे जीवन और काम से उन्हें पूरी तरह आत्मिक खुशी मिलती है। संतोष कुमार सिन्हा की यह कहानी आज के युवाओं के लिए एक मिसाल है, जो यह सिखाती है कि मेहनत, ईमानदारी और अपने पैतृक काम के प्रति निष्ठा से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।