तिरंगा चौक पर पुष्पांजलि और कैंडल जलाकर किया स्मरण, डॉ. मेमन की याद में फिर छलक उठीं आंखें
- गरियाबंद में गरीबों के मसीहा स्वर्गीय डॉ. अब्दुल रज्जाक मेमन की आठवीं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन
- शेख हसन खान, गरियाबंद
गरियाबंद। गरीबों के मसीहा कहे जाने वाले डॉ. अब्दुल रज्जाक मेमन की आठवीं पुण्यतिथि पर शनिवार शाम नगर के तिरंगा चौक में भावपूर्ण श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस दौरान उपस्थित लोगों ने डॉ. मेमन के चित्र पर पुष्प अर्पित किए और कैंडल जलाकर उन्हें श्रद्धापूर्वक याद किया। डॉ. मेमन को याद करते हुए कई लोगों की आंखें नम हो गईं और उनके सेवा भाव से जुड़े संस्मरण एक बार फिर लोगों की जुबां पर आ गए।
डॉ. अब्दुल रज्जाक मेमन ऐसी शख्सियत थे, जो किसी परिचय या तारीफ के मोहताज नहीं थे। एक समय ऐसा था जब गरियाबंद जिले की पहचान डॉ. मेमन के नाम से भी हुआ करती थी। गरियाबंद से बाहर जब कोई अपने शहर का नाम बताता, तो अक्सर सामने से यही सुनने मिलता—“अच्छा, आप उसी गरियाबंद से हैं, जहां डॉ. मेमन रहते हैं?”

यह उनकी लोकप्रियता ही नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में उनके लिए बसे विश्वास और सम्मान की मिसाल थी। लोग उन्हें केवल बीमारी के समय ही नहीं, बल्कि अपने सुख-दुख के हर मौके पर याद करते थे। डॉ. मेमन भी हर वर्ग के लोगों के सुख-दुख में एक परिवार के सदस्य की तरह शामिल होते थे। उनके लिए मरीज केवल मरीज नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा हुआ करता था।
- पैसे नहीं, इंसानियत देखते थे डॉ. मेमन
डॉ. मेमन की सबसे बड़ी पहचान उनका सेवा भाव था। अमीर हो या गरीब, गांव का रहने वाला हो या शहर का—हर तबके के लोग उन्हें अपना डॉक्टर मानते थे। जरूरतमंदों के लिए उनके दरवाजे हमेशा खुले रहते थे।
लोग बताते हैं कि किसी के पास इलाज के पैसे नहीं होते थे, तब भी डॉ. मेमन इलाज करने से पीछे नहीं हटते थे। पैसे नहीं हैं तो दवा कैसे आएगी, इसकी चिंता भी वे स्वयं कर लेते थे। जरूरत पड़ने पर मरीजों को दवा खरीदने के लिए आर्थिक मदद तक करते थे।
यही वजह थी कि गरीब और जरूरतमंद लोग उन्हें केवल डॉक्टर नहीं, बल्कि अपना देवता स्वरूप इंसान मानते थे। आधी रात को किसी की तबीयत बिगड़ जाए और डॉ. मेमन मदद के लिए न पहुंचें—ऐसा लोगों के लिए मानो असंभव सा था। उन्होंने अपने पेशे को सेवा का माध्यम बना दिया था।
कितनी जिंदगियां उन्होंने बचाईं, कितने लोगों को मौत के मुंह से वापस लाया और कितने परिवारों के चेहरों पर मुस्कान लौटाई—इसका हिसाब शायद कभी नहीं लगाया जा सकता। यही कारण है कि आठ साल बाद भी उनकी कमी लोगों को उतनी ही गहराई से महसूस होती है।
- 19 सितंबर 2018… जब पूरा गरियाबंद रो पड़ा था
19 सितंबर 2018 वह दिन था, जिसे गरियाबंद के लोग आज भी नहीं भूल पाए हैं। इसी दिन डॉ. अब्दुल रज्जाक मेमन ने अंतिम सांस ली थी। उनकी अंतिम विदाई का वह मंजर आज भी लोगों की आंखों के सामने है।
उनकी अंतिम यात्रा में हजारों की संख्या में लोग उमड़ पड़े थे। नगर की सड़कों पर गुलाब की पंखुड़ियां बिछी थीं। चौक-चौराहे सूने नजर आ रहे थे और हर आंख नम थी। बच्चे, बुजुर्ग, युवा—हर उम्र के लोग अपने प्रिय डॉक्टर को अंतिम विदाई देने पहुंचे थे।
पूरे जिले से लोग गरियाबंद पहुंचे थे। अंतिम यात्रा के दौरान “डॉ. मेमन अमर रहें” के नारों से माहौल गूंज उठा था। वह केवल एक डॉक्टर की विदाई नहीं थी, बल्कि ऐसे इंसान की विदाई थी, जिसने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा दूसरों की जिंदगी बचाने और जरूरतमंदों की सेवा में लगा दिया था।
- “उनके विचार आज भी युवाओं को प्रेरित कर रहे हैं” — साबिर भाई
श्रद्धांजलि कार्यक्रम के दौरान डॉ. मेमन के करीबी मित्र साबिर भाई अपने मित्र को याद करते हुए भावुक हो उठे। डॉ. साहब को श्रद्धांजलि देते समय उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े।
साबिर भाई ने कहा कि डॉ. मेमन हम सबको हमेशा के लिए अकेला छोड़कर चले गए, लेकिन उनकी यादें और उनके द्वारा कही गई बातें आज भी हमारे साथ हैं। उन्होंने अपने पेशे को सही मुकाम दिया था। उनके लिए सेवा केवल शब्द नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका थी।
उन्होंने कहा कि उन्होंने स्वयं डॉ. मेमन को जरूरतमंद लोगों का इलाज करने के बाद उन्हें दवा खरीदने के लिए पैसे देते हुए देखा है। डॉ. मेमन ने अपना संपूर्ण जीवन जनता की सेवा में लगा दिया। उन्होंने लोगों को सादा जीवन जीने और जरूरतमंद तथा गरीब लोगों के बारे में सोचने की सीख दी। उनके विचार आज भी जिले के युवाओं को प्रेरित कर रहे हैं।
- “गरीबों के मसीहा थे डॉ. मेमन” — पार्षद छगन यादव
पार्षद छगन यादव ने डॉ. अब्दुल रज्जाक मेमन को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि डॉ. मेमन वास्तव में गरीबों के मसीहा थे। उन्होंने अपना जीवन जरूरतमंद लोगों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया था। आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके सेवा भाव और उनकी यादें हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेंगी।
श्रद्धांजलि कार्यक्रम में शाबिर भाई, राम कुमार वर्मा, हरीश भाई, मनोज वर्मा, राजेश साहू, वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश तिवारी, नंद किशोर फुलझेले, चंद्र भूषण चौहान, पार्षद छगन यादव, योगेश बघेल, जुनेद खान, सनी मेमन, बीरू सेन, अवध यादव, पूना यादव, घनश्याम यादव सहित भारी संख्या में प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।
डॉ. अब्दुल रज्जाक मेमन को गुजरे भले ही आठ वर्ष हो गए हों, लेकिन गरियाबंद की यादों में उनका नाम आज भी उसी सम्मान के साथ लिया जाता है। उनके लिए डॉक्टर होना केवल पेशा नहीं, बल्कि इंसानियत की सेवा थी। शायद यही वजह है कि समय बीतने के साथ उनकी याद धुंधली होने के बजाय और गहरी होती जा रही है।
