बदहाल शिक्षा – गरियाबंद एक मात्र कमरा में आंगनबाड़ी के 22 बच्चों के साथ प्राथमिक शाला के 5 कक्षाएं हो रही संचालित
- शेख हसन खान, गरियाबंद
- ग्राम खोलापारा प्राथमिक शाला भवन जर्जर, आंगनबाड़ी में हो रही संचालित
गरियाबंद। गरियाबंद जिले के आदिवासी विकासखण्ड मैनपुर क्षेत्र मे बदहाल शिक्षा व्यवस्था किसी से छिपा नहीं है। इसके बावजूद समस्या समाधान नहीं किया जा रहा है और तो और मामला सामने आने पर सिर्फ कागज मे समाधान खोजा जाता है। कागजी कार्यवाही कर मामले का रफा-दफा करने के कारण समस्याओ का निदान होने के बजाय समस्या बढ़ती जा रही है। आपको जानकर बड़ा आश्चर्य होगा कि एक मात्र 10 फीट कमरे के भीतर आंगनबाड़ी के 22 बच्चे और प्राथमिक शाला के 5 कक्षाएं संचालित हो रहा है जो किसी जादूगरी से कम नहीं है। ऐसा नहीं है कि इस समस्या से शिक्षा विभाग के अधिकारियो को जानकारी न हो गांव के सरपंच और ग्रामीणो ने कई बार आवेदन देकर समस्या के समाधान की दिशा मे ठोस कदम उठाने की मांग कर चुके है लेकिन ग्रामीणो द्वारा उम्मीद के साथ दिये आवेदनो का समाधान तो दूर इन आवेदनो को उच्च कार्यालय तक भी नहीं भेजा गया है। नहीं तो अब तक समस्या का समाधान हो जाता। ग्राम पंचायत दबनई के आश्रित ग्राम जो मैनपुर से लगभग 18 किमी दूर ग्राम खोलापारा है और यहां विशेष पिछड़ी कमार जनजाति के लोग निवास करते हैं। यह जनजाति के विकास के सरकार दावे करते नहीं थकती। ग्राम खोलापारा प्राथमिक शाला भवन बेहद जर्जर हो गया है जिसके कारण यहां के आंगनबाड़ी के एक कमरे के भीतर आंगनबाड़ी के 22 बच्चे तो पढ़ाई करते ही है लेकिन इसी एक कमरे के भीतर शासकीय प्राथमिक शाला खोलापारा के कक्षा पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी और पांचवी के बच्चे भी एक साथ पढ़ाई करते हैं। अब एक कमरे के भीतर आंगनबाड़ी के बच्चे और पांच कक्षाएं कैसे संचालित होता होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
खोलापारा शासकीय प्राथमिक स्कूल का भवन वर्षों से अत्यंत जर्जर और जर्जर अवस्था में ढहने की कगार पर है। हादसों के खौफ से स्कूल को पास ही स्थित आंगनबाड़ी केंद्र में स्थानांतरित कर दिया गया लेकिन यह व्यवस्था राहत की जगह बच्चों के लिए बड़ी मुसीबत बन गई है। आंगनबाड़ी केंद्र के केवल एक छोटे से कमरे के भीतर आंगनबाड़ी के 22 मासूम छोटे बच्चों के साथ-साथ प्राथमिक शाला की कक्षा 1 से 5 तक के सभी छात्र-छात्राओं को एक साथ बिठाकर पढ़ाया जा रहा है। शोर और घूटन के बीच छिनता बचपन एक ही कमरे में आंगनबाड़ी के 22 नौनिहाल खेल-कूद और प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उसी जगह पर 5 अलग-अलग कक्षाओं के बच्चे अपनी पढ़ाई करने को मजबूर हैं, आंगनबाड़ी के बच्चों का रोना-गाना और प्राथमिक स्कूल की पांचों कक्षाओं का अध्यापन एक साथ होने से कमरे में भयंकर शोर की स्थिति बनी रहती है। जगह की भारी कमी कमरा इतना छोटा है कि बच्चों को नीचे बैठने तक की जगह बमुश्किल मिलती है। सुविधाओं का अभाव शुद्ध पीने के पानी और चालू शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं के बिना बच्चे हर दिन घंटों तकलीफ सहते हैं।
- आदिवासी अंचल में शिक्षा व्यवस्था की खुली पोल
आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण गरीब और मजदूर परिवारों के पास अपने बच्चों को इसी सरकारी कुव्यवस्था के हवाले करने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं है स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि वे कई बार प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से नए स्कूल भवन की गुहार लगा चुके हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। सब पढ़ें, सब बढ़ें का नारा देने वाला विभाग इन आदिवासी बच्चों के जान-माल और भविष्य से खिलवाड़ कर रहा है यदि जल्द ही नए भवन का निर्माण या वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई, तो ग्रामीण उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। देखना यह है कि मासूमों की इस बेबसी पर जिम्मेदार अधिकारी कब सुध लेते हैं या किसी बड़े हादसे के इंतजार में हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं।
क्या कहते हैं जनपद सदस्य
जनपद सदस्य प्रताप मरकाम एवं सरपंच रमशिला बाई नेताम ने बताया कई बार नये स्कूल भवन की मांग को लेकर विकासखण्ड शिक्षा कार्यालय मे ज्ञापन सौप चुके है मांग कर चुके है लेकिन अब तक समस्या का समाधान नही हुआ।
