108 घड़े के जल से कराया गया श्री जगन्नाथ जी को महास्नान, उमड़ा आस्था का सैलाब
- शेख हसन खान, गरियाबंद
गरियाबंद। गरियाबंद जिले के अंतर्गत ग्राम अमलीपदर में विराजमान श्री सिद्ध जगन्नाथ मंदिर में देवस्नान पुर्णिमा बड़ी धूमधाम से मनाया गया। सनातन परंपरा में प्रत्येक मास के शुक्लपक्ष की पंद्रहवीं तिथि पूर्णिमा का काफी ज्यादा महत्व माना गया है, लेकिन इसका धार्मिक महत्व तब और भी ज्यादा बढ़ जाता है जब यह ज्येष्ठ मास में पड़ती है और इसे देव स्नान पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। देव स्नान पूर्णिमा को पुरी में ‘स्नान यात्रा’ के नाम से भी जाना जाता है। यह पावन स्नान यात्रा भगवान जगन्नाथ के भक्तों के लिए अत्यंत ही शुभ पर्व होती है क्योंकि इसी दिन अमलीपदर विराजमान श्री सिद्ध जगन्नाथ मंदिर में सारे जगत के नाथ कहलाने वाले भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्र का विशेष जलाभिषेक होता है। श्री जगन्नाथ मंदिर अमलीपदर के मुख्य पुजारी पं युवराज पांडेय जी ने बताया कि देव स्नान पूर्णिमा पर भगवान जगन्नाथ को कराए जाने वाले इस महास्नान का क्या महत्व है।
108 सोने के जल कलश से होता है। भगवान का महास्नान अनुसार ज्येष्ठ मास की पावन पूर्णिमा तिथि पर सारे जगत के नाथ यानि भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और उनके बड़े भाई बलभद्र को गर्भगृह से स्नान मंडप तक ढोल, मृदंग, शंख ध्वनि और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ स्नान मंडप पर लाया जाता है। इसे ‘पहंडी विजय’ के नाम से जाना जाता है। इसके बाद सभी देवताओं का विधि-विधान से महास्नान कराया जाता है। भगवान जगन्नाथ का महास्नान कराने के लिए स्वर्णकूप से 108 घड़ों में जल लाया जाता है। भगवान जगन्नाथ को स्नान कराने से पहले पुजारियों के द्वारा पूजा-अनुष्ठान किया जाता है। घड़ों के जल में पुष्प, चंदन, कपूर, केसर, आदि सुगंधित द्रव्य डालकर विशेष मंत्रों से अभिमंत्रित किया जाता है।
- किस देवता को कितने घड़ों से कराया जाता है स्नान
ज्येष्ठ पूर्णिमा पर इस महास्नान की प्रक्रिया में प्रत्येक देवता के लिए जल से भरों घड़ों की संख्या भी सुनिश्चित होती है। महास्नान के लिए भर कर लाए गये 108 घड़ों के जल में से 35 कलशों के जल से भगवान जगन्नाथ को स्नान कराया जाता है तो वहीं बलभद्र भगवान को 33 जल कलश और सुभद्रा जी को 22 कलश से स्नान कराया जाता है। बाकी बचे 18 कलश से सुदर्शन चक्र का स्नान होता है।
- तब स्नान के बाद बीमार हो जाते हैं भगवान
हिंदू मान्यता के अनुसार स्नान यात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ बीमार पड़ जाते हैं और तीनों देवता मंदिर परिसर में स्थित ‘अनसार’ घर में विश्राम करते हैं। इस दौरान भक्तों को भगवान के दर्शन नहीं होते हैं। भगवान को स्वास्थ्य लाभ के लिए इस दौरान उन्हें औषधि दी जाती है। इसके बाद दो सप्ताह बाद यानि रथ यात्रा के ठीक एक दिन पहले भक्तों को भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और भगवान बलभद्र दोबारा दर्शन होते हैं।
